जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी, 2025 के बाद अधिक तपेगी दुनिया!
मई 31, 2021 | By - नितिन सिंह भदौरिया

जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी, 2025 के बाद अधिक तपेगी दुनिया!

एक ओर विश्वभर में जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए तरह-तरह के जतन किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर एक रिपोर्ट ने क्या विकसित और क्या विकासशील सभी देशों की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, विश्व मौसम संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले पांच सालों में यानि 2025 तक दुनिया का औसत तापमान में 1.5 डिग्री तक बढ़ सकता है। वहीं रिपोर्ट में तापमान में बढ़ोतरी की संभावना 40 प्रतिशत तक है जबकि पिछले अध्ययन में यह संभावना 20 फीसदी थी।

यह रिपोर्ट ब्रिटेन के मौसम विभाग के अलावा अमेरिका और चीन समेत दस देशों को शोधकर्ताओं के साझा अध्ययन पर आधारित है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, धरती का तापमान बढ़ने से बेमौसम बरसात, जंगलों की आग, चक्रवात और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आने की संभवना बढ़ती है। जलवायु के लिहाज से यह इंसानी आफत के संकेत हैं। अगर भारत की बात की जाए तो 1901 से 2018 के बीच भारत का तापमान औसतन 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। वहीं तापमान के बढ़ने के कारण उत्तरी हिंद महासागर, विशेष रूप से अरब सागर में अधिक चक्रवात उठने की आशंका जताई जा रही है। इसका ही प्रभाव ही कि भारत हाल ही में ताऊते और यास जैसे चक्रवातों का साक्षी बना।

जलवायु परिवर्तन – क्या ये दुनियाभर के लिए है वेकअप कॉल

जलवायु परिवर्तन का असर

विश्वभर के वैज्ञानिक पहले ही ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित हैं और इसको लेकर चेतावनी भी जारी कर चुके हैं। ब्रिटेन के वरिष्ठ मौसम विज्ञानी लियन हरमैनसन का कहना है कि जब हम 1850-1900 के समय के तापमान से तुलना करते हैं तो अंतर साफ़ दिखाई देता है। इस दौरान तापमान बढ़ा है और ताज़ा अध्ययन यह बताता है कि हम 1.5 डिग्री के क़रीब पहुंच रहे हैं। यह कुछ कड़े निर्णय लेने का समय है ताकि समय हमारे हाथ से ना निकल जाए। रिपोर्ट में दिया गया यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनियाभर के अधिकतर नेताओं ने जलवायु परिवर्तन को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित करने की बात कही थी। इस संबंध में डब्ल्यूएमओ के महासचिव ने चेताया है कि यह दुनिया भर के लिए एक और वेकअप कॉल है।

पेरिस समझौता का लक्ष्य

गौरतलब है कि पेरिस समझौते के तहत वैश्विक औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि ना होने देने और 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार ना करने के प्रयास करने का लक्ष्य स्थापित किया था। तापमान सम्बन्धी इस दीर्घकालीन लक्ष्य को पाने के लिए देशों का लक्ष्य, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के उच्चतम स्तर पर जल्द से जल्द पहुंचना है, ताकि उसके बाद, वैश्विक स्तर पर इसमें कमी लाने की प्रक्रिया शुरू की जा सके।पेरिस समझौते के ज़रिए 21वीं सदी के मध्य तक कार्बन तटस्थता (नैट कार्बन उत्सर्जन शून्य) हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। जलवायु परिवर्तन कार्रवाई के लिए बहुपक्षीय प्रक्रिया में पेरिस समझौता एक अहम पड़ाव है।

क्या है पेरिस समझौता

पेरिस समझौता

पेरिस समझौता (Paris Agreement)पांच-वर्षीय चक्र पर केन्द्रित है, जिसके तहत देश महत्वाकांक्षी जलवायु कार्रवाई का दायरा बढ़ाते जाते हैं। वर्ष 2020 तक देशों ने जलवायु कार्रवाई के लिए अपनी योजनाएं पेश की हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions (NDCs) कहा जाता है।

एनडीसी

राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं (NDCs) में देश, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती करने के लिए अपनी योजनाओं व कार्रवाई के बारे में जानकारी पेश करते हैं, जिससे पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्य हासिल किए जा सकें। इन योजनाओं में देश, तापमान में बढ़ोत्तरी से होने वाले प्रभावों से निपटने के लिए सहनक्षमता के निर्माण के लिए उपायों की भी जानकारी पेश करते हैं।

जलवायु परिवर्तन की दीर्घकालीन रणनीति

दीर्घकालीन लक्ष्यों की दिशा में प्रयासों को बेहतर ढंग से संगठित करने के लिए, पेरिस समझौते में देशों को कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए अपनी रणनीतियों के बारे में जानकारी साझा करने के लिए आमन्त्रित किया गया है। इस रणनीति को Long-term low greenhouse gas emission development strategies (LT-LEDS) नाम दिया गया है। LT-LEDS के ज़रिए राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं से, लम्बे समय बाद होने वाले असर को क्षितिज पर, यानि व्यापक दायरे में देखने का उद्देश्य रखा गया है, लेकिन एनडीसी की तरह वे अनिवार्य नहीं हैं। इसके बावजूद ये, देशों की दीर्घकालीन योजनाओं और विकास प्राथमिकताओं का एक अहम घटक हैं, जिनसे भावी विकास योजनाओं के बारे में दिशा और दूरदृष्टि निर्धारित होती है।

जलवायु परिवर्तन – दुनियाभर के लिए है बुरी खबर

लंदन के इंपीरियल कॉलेज में ग्रांथम इंस्टिट्यूट के शोध निदेशक डॉक्टर जोएरी रोगेल्ज के अनुसार, मौसम विभाग की इस घोषणा में बताये गए 1.5 डिग्री सेल्सियस की तुलना पेरिस समझौते में शामिल 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि पेरिस समझौते में ग्लोबल वॉर्मिंग (जलवायु परिवर्तन) की बात की जाती है, जिसमें हमारे ग्रह का तापमान साल दर साल एक जैसा रखने का प्रयास किया जाता है। एक ही साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस के बदलाव से ना सिर्फ़ पेरिस समझौते का उल्लंघन होता है, बल्कि यह हम सबके लिए एक बहुत बुरी ख़बर भी है।

उत्सर्जन को शून्य तक जाना जरूरी

डॉक्टर जोएरी रोगेल्ज ने कहा, यह हमें एक बार फिर से बताता है कि अपनी जलवायु की सुरक्षा के लिए किये गए हमारे प्रयास नाकाफ़ी हैं। हमें अपने उत्सर्जन को जल्द से जल्द शून्य तक लाना पड़ेगा ताकि जलवायु परिवर्तन को रोका जा सके।

जलवायु परिवर्तन

साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र के एक पैनल ने एक ऐतिहासिक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे हमारे ग्रह के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की वृद्धि हमारी जलवायु पर बहुत बुरा असर डाल सकती है। अभी के अनुमानों के अनुसार, ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए किए गए प्रयासों के बावजूद, हमारे ग्रह का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग के एक जलवायु वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एड हॉकिन्स ने बताया कि अगर ये नया पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम पेरिस समझौते की सीमा को पार जाएंगे। वो बताते हैं कि साल 2016 में भी दो अलग-अलग महीनों के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस का उछाल देखा गया था। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, एक साल में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा गर्म महीनों की संख्या बढ़ेगी। फिर ऐसा और ज़्यादा होगा, फिर शायद यह तापमान दो-तीन साल के लिए बढ़ जायेगा और कुछ समय बाद हर साल यह तापमान बढ़ा हुआ ही रहेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि हमें बढ़ते हुए तापमान को रोकना ही होगा। इसके लिए हमें सबसे पहले इस बात को पहचानने की ज़रूरत है कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया में देखा जा सकता है और यह आने वाले समय में ख़राब ही होगा।

उम्मीद है कि आपको इस ब्लॉग में दी गई जानकारी पसंद आई होगी। AlShorts लगातार ऐसे ही विषयों पर आपको दिलचस्प जानकारी उपलब्ध कराता रहेगा। हमारे साथ जुड़े रहें और पढ़ते रहिए देश और दुनिया से जुड़े रोचक ब्लॉग्स।

AVAILABLE ON

Optimized with PageSpeed Ninja