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वर्क फ्रॉम होम: जब घर में शिफ्ट हुआ ‘दफ्तर’…
सितम्बर 22, 2020 | By - Vaibhav Sharma

वर्क फ्रॉम होम: जब घर में शिफ्ट हुआ ‘दफ्तर’…

आपने इंटरनेट और अख़बारों के जरिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ के कई इश्तिहार पढ़े होंगे। जिनमें कर्मचारियों को लुभाने के लिए आकर्षक वेतन और सुविधानुसार काम करने की आजादी दी गई होती है। इसका सीधा सा फंडा है, कम पैसों ‘आउट सोर्सिंग’ के जरिए अपना काम करवाना। जरा आउट सोर्सिंग को समझिए, कनाडा की कम्पनी भारत में आउट सोर्सिंग के जरिए काम करवाना चाहती है। मतलब ऐसा नहीं है कि उनके पास कर्मचारी नहीं है बल्कि आउटसोर्सिंग का मुख्य लाभ है खर्चों में कटौती करना । अब कंपनी और कर्मचारियों के बाद, आप हुए थर्ड पार्टी यानि ‘तीसरा पक्ष’। अब आप चाहे जब अपनी मर्जी के अनुसार खाली समय में बैठकर उसका काम कर सकते हैं। कंपनी का खर्चा बचा, आपको अपनी सुविधानुसार काम करने की आजादी मिली। यह संभव हुआ इंटरनेट के कारण, जिसके चलते आज वैश्विक संचार बेहद आसान हो गया है। अब आते हैं मुद्दे की बात पर, आज का मुद्दा है कोरोना काल में ‘वर्क फ्रॉम होम’। कोरोना काल ने वर्क फ्रॉम होम जैसे शब्द को अब प्रोफेशनल बना दिया है। यानि कुछ महीनों पहले जो ‘पार्ट टाइम’ समझा जाता था वो अब फुल टाइम हो चुका है। भारत में कई बड़ी कंपनियों के कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं। इसमें कंपनियों ने वेतन में 30% तक की कटौती करते हुए घर से काम की इस सुविधा को दुविधा बना दिया है। इससे लोगों में नौकरी जाने का डर, आपसी संवाद की कमी, मानसिक बीमारियां और दबाव साफ़ महसूस किया जा सकता है। 

दफ्तर और घर की हुई ‘कहासुनी’ 

घर में आप भाई, बेटे, पति या पिता हो सकते हैं, लेकिन कंपनी के लिए आप एक कर्मचारी हैं। कंपनी उस दौरान आपसे कई सवाल और जवाब मांग सकती है। दरअसल, वर्क फ्रॉम होम ने हमसे यह अधिकार छीन लिया है। लॉकडाउन के कारण ऑफिस घर पर शिफ्ट हो गया है, इसके साथ ही ऑफिस के काम का दबाव भी। ऐसे में, लोगों को कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। कंपनी ने काम करने का समय वही रखा है लेकिन काम के दबाव को बढ़ा दिया है। भारत को वर्क फ्रॉम होम कल्चर समझने में काफी वक़्त लग सकता है। इसकी वजह, बॉस सोचते हैं कर्मचारी घर पर काम नहीं कर रहे। इधर, कर्मचारी ऑफिस और घर दोनों की जिम्मेदारियों के बीच सुकून ढूंढ़ता रहता है। वहीं सबसे ज्यादा नुकसान चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को हुआ है। वे ना तो घर से काम कर सकते हैं ना ही ऑफिस जा सकते हैं।

इधर दफ्तर की परेशानी 

जहां कर्मचारी परेशान हैं वहीं कई दफ्तरों की ओर से भी कर्मचारियों को लेकर शिकायतें हैं। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि यौन उत्पीड़न के मामले अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हो रहे हैं। एक कर्मचारी शराब पिए हुए ऑफिस की मीटिंग में शामिल हो गया। वहीं दूसरी तरफ खबरों के अनुसार, एक कर्मचारी ने महिला सहकर्मी का स्क्रीनशॉट उसकी इजाजत के बिना ले लिया। महिलाओं को आने वाली परेशानियों की लिस्ट काफी लम्बी है। इसे लेकर भी ऑफिस प्रबंधन को जागरूक होना होगा। कंपनियों का मानना है कि कई कर्मचारी वर्क फर्म होम को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उनके कार्य के स्तर में गिरावट आई है, ‘इंटरनेट कनेक्टिविटी’, ‘आवश्यक कार्य’ और ‘मेडिकल इमरजेंसी’ जैसे शब्दों को बढ़ावा मिला है। साथ ही, ‘सामाजिक व्यवहार’ में भी शिथिलता आई है। 

घर से काम का नया परिवेश 

दूसरी तऱफ, कई कंपनियां इसे फायदे का सौदा मान रही हैं। जहां, अब मूलभूत सुविधाओं को लेकर खर्चा कम हुआ है। बड़ी कंपनियों की पेट्रोल, बिजली और अन्य सुविधाओं में बचत हो रही है। साथ ही घर बैठे कर्मचारी भी काम के साथ अपनी अन्य योजनाएं भी पूरी कर रहे हैं। हां, जानकारों के मतानुसार, स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफें जरूर बढ़ीं हैं। लेकिन, वे इस महामारी से गंभीर नहीं हैं। इस नए परिवेश में ढलना हालांकि, इतनी बड़ी परेशानी नहीं है। लेकिन मुद्दा यह है कि ‘घर से काम’ और ‘घर के कामों’ की जिम्मेदारियां बढ़ गईं हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई गिरावट से इस ओर कई अवसर भी मिले हैं तो संकट भी आए हैं। इसमें केवल खुद को दोषी ना माने, आपकी तरह कई कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम कल्चर को अपना रहे हैं। 

अंत में, ‘अंतरजाल’ (इंटरनेट) की इस दुनिया में नया सीखे और केवल ‘कोरोना पॉजिटिव’ आने से बचे ‘पॉजिटिव विचारों’ को ना त्यागे। वर्क फ्रॉम होम आपके और आपके परिवार की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है। आपदा में फायदा ढूंढ़ना ‘सार्वभौमिक अपराध’ है, इससे कंपनियां और कर्मचारी दोनों बचें। यह जरूर ध्यान रखें कि यह महामारी एक दिन ख़त्म हो जाएगी और फिर से एक नई सुबह आएगी। 

ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं 

ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं 

– माहिर-उल क़ादरी

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