ब्लैक फंगस से कहीं ज्यादा खतरनाक है व्हाइट फंगस, यहां जान लीजिए इसके लक्षण
मई 20, 2021 | By - नितिन सिंह भदौरिया

ब्लैक फंगस से कहीं ज्यादा खतरनाक है व्हाइट फंगस, यहां जान लीजिए इसके लक्षण

कोरोना महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहे भारत की मुश्किलें लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। सरकार अभी महामारी के बीच सामने आए ब्लैक फंगस (Black fungus) से निपटने के लिए रणनीति ही बना रही थी कि देश में व्हाइट फंगस (White Fungus) नाम की एक और आफत ने दस्तक दे दी है। डॉक्टरों का कहना है कि व्हाइट फंगस पहले पाए गए ब्लैक फंगस से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है।

पटना में मिले चार मामले

पटना में मिले व्हाइट फंगस के मामले
पटना में मिले व्हाइट फंगस के मामले

पटना मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल (PMCH) में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के हेड डॉ. एसएन सिंह के मुताबिक, अब तक व्हाइट फंगस के चार मरीज मिले हैं। इनमें कोरोना जैसे ही लक्षण थे, लेकिन इनकी कोरोना की टेस्ट रैपिड एंटीजन, रैपिड एंटीबॉडी और RT-PCR रिपोर्ट निगेटिव आईं। इसके बाद पता चला कि इन्हें White Fungus हुआ है। गनीमत रही कि डॉक्टरों ने तत्काल एंटी फंगल दवाओं से इलाज शुरू किया, जिससे मरीज ठीक हो गए।

आसान नहीं व्हाइट फंगस की पहचान 

  • HRCT में कोरोना जैसे ही दिखते हैं व्हाइट फंगस के लक्षण।
  • कोरोना की तरह फेफड़ों को संक्रमित करता है व्हाइट फंगस।
  • कोरोना और व्हाइट फंगस में अंतर करना है बेहद मुश्किल।
  • कोरोनाके लक्षण होने के बाबजूद भी रिपोर्ट आती है निगेटिव।
  • नाखून, स्किन, पेट, किडनी, ब्रेन, प्राइवेट पार्ट्स और मुंह के अंदर होता हैसबसे ज्यादा असर।

इन लोगों को अधिक सावधानी की जरूरत

चिकित्सकों का कहना है कि डायबिटीज, एंटीबायोटिक का सेवन या फिर स्टेरॉयड का लंबा सेवन करने वाले लोगों को व्हाइट फंगस आसानी से अपनी गिरफ्त में ले सकता है। वहीं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को इससे सबसे अधिक खतरा हो सकता है। वहीं नवजात में यह डायपर कैंडिडोसिस के रूप में होता है, जिसमें क्रीम कलर के सफेद धब्बे दिखते हैं। जबकि छोटे बच्चों में यह ओरल थ्रस्ट करता है तो वहीं महिलाओं में यह ल्यूकोरिया का मुख्य कारण है।

चिकित्सकों ने कहा कि हालात बहुत नाजुक हैं ऐसे में हमें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। जरा सी चूक हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इस समय जो मरीज किसी कारणवश ऑक्सीजन की मदद से सांस ले रहे हैं या फिर वेंटिलेटर पर हैं। ऐसे मरीजों पर विशेष ध्यान की जरूरत है। उनके ऑक्सीजन या वेंटिलेटर उपकरण विशेषकर ट्यूब आदि जीवाणु मुक्त होने चाहिए। इसके साथ ही ऑक्सीजन सिलेंडर ह्यूमिडिफायर में स्ट्रेलाइज वाटर का प्रयोग करना चाहिए, जो ऑक्सीजन मरीज के फेफड़े में जाए वह फंगस से मुक्त हो।

विशेषज्ञों ने दी ये सलाह

विशेषज्ञों ने अगाह किया है कि व्हाइट फंगस में कोरोना जैसे लक्षण होने के बावजूद भी रैपिड एंटीजन और RT-PCR रिपोर्ट निगेटिव आए और जिनके HRCT में कोरोना जैसे लक्षण हों, उनका रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट कराना चाहिए। इसके अलावा बलगम के फंगस कल्चर की जांच भी कराना चाहिए। इससे व्हाइट फंगस से संक्रमित होने के बारे में पता चल सकेगा।

हाल ही में भारत में कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों में ब्लैक फंगस या म्यूकरमाइकोसिस (Mucormycosis) के मामले देखने को मिले थे। इसके चलते कई मरीजों की मौत भी हो गई थी। राजस्थान में करीब 400 लोग ब्लैक फंगस की वजह से आंखों की रोशनी खो चुके हैं। वहीं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में ब्लैक फंगस के मामले सामने आ चुके हैं।

ब्लैक फंगस के लक्षण

भारत में ब्लैक फंगस
भारत में ब्लैक फंगस

ब्लैक फंगस के मरीजों में नाक से काला द्रव या खून की पपड़ी निकलना, नाक का बंद होना, सिर दर्द या आंखों में दर्द, आंखों के आसपास सूजन आना, धूंधला दिखना, आंखे लाल होना, आंखों की रोशनी जाना, आंख खोलने और बंद करने में परेशानी महसूस करना, चेहरा सुन्न हो जाना, चेहरे में झुरझुरी महसूस करना जैसे लक्षण देखने को मिल रहे हैं। सरकार ने भी दिशा-निर्देश जारी कर कहा है कि ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में संपर्क करें।

क्यों फैल रहा ब्लैक फंगस? 

कोरोना संक्रमितों को स्टेरॉयड देने पर उनकी इम्युनिटी कम हो जाती है। शुगर लेवल अचानक बढ़ जाता है। नाक, चेहरे और तलवे की स्किन सुन्न हो जाती है। आंख की नसों के पास फंगस जमा हो जाता है, जो सेंट्रल रेटाइनल आर्टरी का ब्लड फ्लो बंद कर देता है। इससे मरीजों की आंखों की रोशनी चली जाती है।

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