जहन्नुम में जाने से बचाता है अशरा, रमदान में खास है इसका महत्व
अप्रैल 20, 2021 | By - ALSHORTS

जहन्नुम में जाने से बचाता है अशरा, रमदान में खास है इसका महत्व

हर मुस्लिम के नजदीक रमदान की खास अहमियत होती है। इसमें दिनों के हिसाब से अकीदतमंद तीस या उनतीस दिनों तक रोजे रखते हैं। इस्लाम के मुताबिक, पूरे रमदान को तीन हिस्सों में बांटा गया है, इसमें पहला अशरा यानी माह के दस दिन, दूसरा और तीसरा अशरा भी इसी तरह दस-दस दिन का होता है। यह एक अरबी शब्द है, जिसे दस नंबर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह रमदान के पहले दस दिन (1-10) में पहला अशरा, दूसरे 10 दिन (11-20) में दूसरा अशरा और तीसरे दिन (21-30) में तीसरा अशरा बंटा होता है।

पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का होता है और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने के लिए होता है। माना जाता है रमदान के महीने को लेकर पैगंबर मोहम्मद ने कहा है, रमदान की शुरुआत में रहमत है, बीच में मगफिरत यानी माफी है और इसके अंत में जहन्नुम की आग से बचाव है। रमदान के शुरुआती 10 दिनों में रोजा-नमाज करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमदान के बीच यानी दूसरे अशरे में मुसलमान अपने गुनाहों से पवित्र हो सकते हैं। वहीं, रमदान के आखिरी यानी तीसरे अशरे में जहन्नुम की आग से खुद को बचा सकते हैं। आइये जानते हैं रमदान के पहले 10 दिन यानी पहले अशरे का महत्व…।

रमदान के पहले 10 दिन

रमदान महीने के पहले 10 दिन रहमत के होते हैं। यानी सच्चे मन से अल्लाह की इबादत करने वालों पर अल्लाह की रहमत होती है। रमदान के पहले अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा दान कर के गरीबों की मदद करनी चाहिए। हर एक इंसान से प्यार और नम्रता का व्यवहार करना चाहिए।

रमदान

रमदान का दूसरा अशरा

रमदान के 11वें रोजे से 20वें रोजे तक दूसरा अशरा चलता है। यह माफी का होता है। इसमें लोग इबादत कर के अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। इस्लामिक मान्यता के अनुसार अगर कोई इंसान दूसरे अशरे में अपने गुनाहों की माफी मागता है तो दूसरे दिनों के मुकाबले इस दिन अल्लाह अपने वंदो को जल्दी माफ करते हैं।

 रमदान

रमदान का तीसरा अशरा

रमदान का आखिरी अशरा जहन्नुम की आग होता है। इसमें इबादत करने से लोगों के गुनाह माफ हो जाते हैं। वहीं अल्लाह इबादत करने वालों के लिए जन्नत के द्वार खोल देते हैं। इसी अशरे में एतकाफ भी किया जाता है। जो गुनाहों के माफ होने का एक बड़ा जरिया है।

Holy Month of Ramadan

रमदान में 20वें रोजे के मगरिब से शुरू होकर चांद रात तक मस्जिद में रहकर अल्लाह की इबादत करने एतकाफ कहलाता है।

AVAILABLE ON

Optimized with PageSpeed Ninja